दुनिया के चाल फरेब से अनजानी
निष्कपट , निश्छल , निर्मोही , अधखुली
दो आँखें , तुझे हर क्षण
प्रतिपल अवलोकित कर रही थी|
वो दो आँखें बन सकती थी -
किसी वैज्ञानिक की आँखें ,
वो बन सकती थी -
किसी सैनिक , किसी खिलाड़ी की आँखें
वो कुछ भी बनने को उतावली थी |
पर तुझे तो पता नहीं होगा न ;
तुने उसे क्या बना डाला
तो सुन -------
तुने उसे दुनियादारी सिखाने के बहाने
ज़िन्दगी जीने के नुस्खे बताने के बहाने
सिखाई यही फरेबी दुनियादारी
तो क्या वो बन पाई
तुम्हारे सपनों सदृश -
एक चतुर , मक्कार , कपटी आदमी की आँखें
नहीं न
वो बन भी नहीं सकती थी क्यूंकि -
उसे तो बनना था - एक वास्तविक इंसान की आँखें
पर वो बन के रह गई -
केवल एक आसक्त व्यक्ति की आँखें
जो देख सब सकती हैं पर
न बोल सकती हैं , न कुछ कर सकती हैं |
ur writting is really ....ALANKRIT...
ReplyDeletethanks ayushman
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