रिश्ते – क्या होते हैं ये
रिश्ते ? क्या होती है इनकी परिभाषा ?
क्या कोई बतलायेगा मुझे इन
रिश्तों कि आधारशिला ?
हमने तो देखा है, बस इनमे
छुपी हुई अभिलाषा ||
ज़िंदगी की शुरूवात होती है
कुछ रिश्तों के साथ ,जो शुरू होते ही हैं, कुछ शर्तों के साथ |
इस सफर कि डगर पर मिलते हैं
कुछ लोग..... जुड जाता है उनसे इक रिश्ता |
पर आता है वो ले कर साथ में
इक नाम, और बही-खाता ||
रिश्ते अब बनते नहीं, बनाये
जाते हैं, और बाद में रस्मों के नाम पर निभाए जाते हैं |
इन रिश्तों में भी एक अजीब
सी होड़ है, हर पल खुद को सच्चा साबित करने कि दौड़ है ||
आज इस भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी
में रिश्ते रह गए हैं – बस इक नाम |
हर इक नाम के साथ शुरू होती
है, एक सीमा रेखा और कुछ मर्यादा |
क्यूँ बाँधना होता है हर
रिश्तों को एक नाम से ?
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